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Monday, 16 April 2018

हकीक़त के छाले

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मुझे लगते ख़्वाबों के ये अफ़साने है प्यारे बड़े
असल में तो दुखते है हकीक़त के छाले बड़े

किसे कहूँ यार अपना,नहीं कोई अब दिलदार अपना
दिल को मेरे खलते हैं अपनों के ये दिखावे बड़े

लम्हा है ख़ुशी का जी भर के मुस्कुराने दो इन्हें
मेरी आँखों ने सैलाब ग़मों के है बाअदब संभाले बड़े

ऊँचें मकानों में ही नहीं रहा करते अमीर सभी
मिट्टी के इन महलों में भी बसते है दिलवाले बड़े

रोशनी का ज़रिया इक ये आफ़्ताब ही तो नहीं
चराग़ उम्मीदों के भी करते हैं जहां में उजाले बड़े

शिवानी मौर्य
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Friday, 13 April 2018

एक तलाश "खुद" की


इक सफर 
ऐसा भी तय हो
मंज़िल जिसकी तुम,
तुम ही रहगुज़र हो
खुद से भटक कर 
जहाँ पहुँच खुद तक जाना हो 
खोकर खुद को
खुद ही को पाना हो
समाज ये खोखला
खोखलें इसके कायदे है
झूठी है हर रीत
झूठे इसके सब वायदे है 
तो उतार फेंको 
ढकोसलों का ये चोला
निकल पड़ो घर से 
लेकर अपने अस्तित्व का झोला
ये बेड़ियाँ तुमको जकड़ेंगी
आगे बढ़कर पकड़ेंगी
लहरें रुख़ तुम्हारा मोड़ेंगी
संभव है तुमको झकझोरेंगी
कश्ती अपनी तुमको 
जो पार है लगाना 
तो बन पतवार साहिल तक
खुद को है पहुँचाना 
उजाले की प्यास में कब तक 
जुगनू के पीछे भागा जाए
क्यूं न अपनी हथेली 
पर ही सूरज उगाया जाए
अंतर्मन के नभ में
बेधड़क उड़ जाना हो
ऐसा भी जीवन में 
पल कोई मनमाना हो
इक बाज़ी 
खेल में ऐसी भी हो
हराकर खुद को
जीत "खुद" को जाना हो||
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Wednesday, 4 April 2018

तुम ठान लो


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हो जाये बौने
ये विघ्नों के पर्वत भी
कद हौंसलो का
कुछ यूँ तुम बढ़ा लो
आँगन में तुम्हारे भी
आयेगा भोर का उजियारा
बस एक सूरज आशा वाला
चौखट पे तुम टांग लो
ये अक्षमताएं तुम्हारी
देहिक है,सीमित है
अंतर में छिपी
अपार योग्यता को
तुम पहचान लो
चूर-चूर हुई विराट चट्टानें भी
जल धारा के नित बहाव से
यत्न प्रयन्त किये बिना
आसानी से फिर तुम
क्यूँ हार मान लो
करके अपने इरादें
मज़बूत दे दो
असफलता को मात
होगी तुम्हारी जीत
जो तुम ठान लो ||

Wednesday, 14 February 2018

इज़हार



हमने तो कई दफे किया हाल-ए-दिल बयाँ 
है ग़र इश्क़ तम्हें भी,तो इज़हार करना चाहिए

हमने तो अक्सर ही तेरी राह तकी पलके बिछाकर
किसी रोज़ तुम्हें भी हमारा इंतिज़ार करना चाहिए

हम तो रंग गये है तेरी उल्फ़त में सुर्ख गुलाबी
रंग-ए-मोहब्बत का तुम पर भी ख़ुमार चढ़ना चाहिए

हमें तो लग गया है इश्क़ का ये मर्ज़ बुरा
मर्ज़-ए-इश्क़ में तुमको भी बीमार दिखना चाहिए

हमने तो लुटाया सुकून इस दिल का हसंकर
दर पर तेरे भी बे-क़रारी का ये बाज़ार लगना चाहिए

Thursday, 28 December 2017

ऐ काश!!






ऐ परिंदे काश मैं तुझ-सी होती 
तोड़ सब बंदिशें,बेपरवाही से पंख लेती पसार
नील गगन में,मस्त पवन संग उड़ जाती 
कहीं दूर फलक में होकर बादलों पर सवार||

ऐ समुन्दर काश मैं तुझ-सी होती 
क्षितिज होता मेरा भी अम्बर के पार
अडिग,अविचल मैं अनवरत बहती जाती  
समेट हर व्यथा खुद में करती दृढ़ता का विस्तार||

ऐ कलम काश मैं तुझ-सी होती
सच ही होता मेरे हर अक्षर का आधार
हर्फ़ हर्फ़ जोड़ सुन्दर एक कविता लिखती
या ख़ामोशी से करती कुरीतियों पर प्रहार||

ऐ पुष्प काश मैं तुझ-सी होती
निश्छल,सुन्दर,सहज होता मेरा भी संसार
सबके मन को प्रेम की सुगंध से महकाती 
पतझड़ में भी खिलाती उम्मीदों की बहार||

ऐ दीप्ती काश मैं तुझ-सी होती 
उमंगों की रोशनी का होता मेरा व्यापार
कर्मपथ पर साहस की ज्योत जलाती
और करती अंधकार के सीने पर अनगिनत वार||
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Wednesday, 20 December 2017

जिंदगी है जिंदादिली के लिए..😊




बहुत कुछ खोना पड़ता है 
कुछ थोड़ा-सा पाने के लिए
तिनका-तिनका संजोना पड़ता है 
यहाँ आशियां बनाने के लिए..

खुद ही मरहम लगाना पड़ता है 
दर्द के शरारों को सुखाने के लिए
एक-एक हसीं का हिसाब देना पड़ता है 
यहाँ रत्ती भर खिलखिलाने के लिए..

गिरेबां को सदाक़त से सजाना पड़ता है 
अपने किरदार को महकाने के लिए
काँटों के बीच पलना पड़ता है 
यहाँ गुलाब-सा खिल जाने के लिए.. 

सूर्य की तरह खुद को जलाना पड़ता है 
धुप अपने आँगन में लाने के लिए 
आँख हो भरी फिर भी मुस्कुराना पड़ता है 
यहाँ ग़मों को शिकस्त का मज़ा चखाने के लिए..

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Saturday, 16 December 2017

मैं उम्मीद हूँ



माना अँधेरा घना है पसरा हर ओर
पर आस का चमकीला सितारा
मैं इसमें ओझल होने कैसे दूँ
मैं उम्मीद हूँ,तुम्हें ना उम्मीद होने कैसे दूँ|

माना वीरान है दिल की ज़मीं
पर बीज तमन्ना का उगाये बगैर
मैं इसे बंजर होने कैसे दूँ
मैं उम्मीद हूँ,तुम्हें ना उम्मीद होने कैसे दूँ|

माना पाँव में है छाले बड़े
पर बीच डगर में रूककर
मैं इन्हें विश्राम करने कैसे दूँ
मैं उम्मीद हूँ,तुम्हें ना उम्मीद होने कैसे दूँ|

माना पंख होंसलों के है पस्त
पर क्षितिज तक उड़ान भरे बगैर
मैं इन्हें थकने कैसे दूँ
मैं उम्मीद हूँ,तुम्हें ना उम्मीद होने कैसे दूँ|

माना ख़वाब है बड़े महंगे इस शहर में
पर इन सपनीली आँखों को
मैं गरीब होने कैसे दूँ
मैं उम्मीद हूँ,तुम्हें ना उम्मीद होने कैसे दूँ|

माना साहस है टुकड़ो में छिटका पड़ा
पर किसी सस्ते कांच की भांति
मैं इसे बिखर जाने कैसे दूँ
मैं उम्मीद हूँ,तुम्हें ना उम्मीद होने कैसे दूँ|

गिरकर उठने का,खोकर पाने का
उजड़ कर बसने का ये सिलसिला टूटने कैसे दूँ
हाँथ मेरे दामन से तुम्हारा छूटने कैसे दूँ
मैं उम्मीद हूँ,तुम्हें ना उम्मीद होने कैसे दूँ||

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