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Tuesday, 19 September 2017

एक चाहत



एक चाहत उसकी भी थी
रिमोट वाली कार की
पर लड़की हो तुम,
गुड़िया से खेलो
उसके जैसा स्वाभाव ले लो
ख़ामोशी से तुम सब सह लो

एक चाहत  उसकी भी थी
अंग्रेजी स्कूल जाने की
पर लड़की हो तुम,
हिंदी माध्यम में पढ़ो
ब्याह आराम से हो जाए
इतनी बस तुम शिक्षा ले लो

एक चाहत  उसकी भी थी
बल्ला थाम बड़ा एक खेल खेल जाने की
पर लड़की हो तुम,
हाथ में बेलन पकड़ो
रसोई को कोई खेल मत समझ लो
गोल रोटी तुम बनाना सीख लो

एक चाहत  उसकी भी थी
कुल का नाम जग में रोशन करने की
पर लड़की हो तुम,
दीपक बनने का प्रयास मत करो
बेटी धर्म को निष्ठा से निभा लो
पराये घर में सबकी तुम साख़ बचा लो

एक चाहत उसकी भी थी
काँधे से कान्धा मिलाकर चलने की
पर लड़की हो तुम,
अपनी सीमा को मत लांघो
गृहस्थी के व्रत को धारण कर लो
घर को चलाने की तुम आदत डाल लो

एक चाहत उसकी भी थी
अपनी हर ख्वाहिश को पूरा करने की
पर लड़की है वो ,
हसरतें रखने की वो हक़दार नहीं
वो तो जनम लेती है
सबकी इच्छा से जीने के लिए..


©vibespositiveonly


Saturday, 16 September 2017

इंतज़ार



वो आँखें
जो रात-रात जग कर
तुमको  सुलाया करती थी
हाँ, उन सूनी, धीमी आँखों
को भी इंतज़ार है..

वो आलिंगन
जो अक्सर खुद में समेट कर
तुमको महफूज़ रखा करता  था
हाँ, उस कमज़ोर आलिंगन
को भी इंतज़ार है..

वो उँगलियाँ
जो थम कर नन्हे हाँथ
तुमको चलाया करती थी
हाँ,उन बेबस उँगलियों
को भी इंतज़ार है..

वो काला टीका
जो हर दफ़ा रक्षक बन
तुमको बुरी नज़रों से बचाया करता था
हाँ,उस सफ़ेद पड़ गये टीके
को भी इंतज़ार है..

वो निवाले
जो बस एक और,अच्छा ये आख़री
बोल तुमको भूख से ज्यादा खिलाया करती थी
हाँ,उन भूखे निवालों
को भी इंतज़ार है..

वो आशीर्वाद
जो किस्मत को भी पीछे छोड़
तुमको सफलता की सीढ़ी चढ़ाया करता था
हाँ,उस भूले बिसरे आशीष
को भी इंतज़ार है..

वो कंधें
जो बड़े शौक से
तुमको मेलों की सैर कराया करते थे
हाँ,उन थके कांधों
को भी इंतज़ार है..

वो लाड़
जो बेहिसाब बेमतलब ही
तुम पर लुट जाया करता था
हाँ,उस तनिक भी कम ना हुए लाड़
को भी इंतज़ार है..

वो डांट
जो हर गलती पर
तुमको सही-गलत का पाठ पढ़ाया करती थी
हाँ,उस ख़ामोश पड़ी डांट
को भी इंतज़ार है..

वो दिल
जो जानता है,तुम अब ना लौटोगे
फिर भी अनजान बन जाया करता है
हाँ,उस टूटे दिल
को भी इंतज़ार है..

वो वादा
जो कर गए थे
तुम लौट कर आने का
वापस संग घर ले जाने का
हाँ,अधूरे ही सही पर उस वादे
को आज भी इंतज़ार है
बेटा तुम्हारे लौट आने का...!

©vibespositiveonly

Thursday, 14 September 2017

तुम्हें लिख दूँ ..💘

💖💖💖💖💖💖💖💖

मैं ग़र ढलती संध्या ,तो तुम्हे सुबह का सूरज लिख दूँ..
मैं ग़र गर्मी की तपिश,तो तुम्हें सावन की फुहार लिख दूँ ..
मैं ग़र धरा,तो तुम्हें नीला आकाश लिख दूँ..
मैं ग़र आगाज़ नया ,तो तुम्हें खूबसूरत अंजाम लिख दूँ..
मैं ग़र पंख बेबाक ,तो तुम्हें ऊँचा परवाज़ लिख दूँ..
मैं ग़र नदी इठलाती ,तो तुम्हें गहरा सागर लिख दूँ..
मैं ग़र फूल कोमल ,तो तुम्हें मस्त बहार लिख दूँ..
मैं ग़र रात अन्धयारी ,तो तुम्हें चंदा चकोरा लिख दूँ..
मैं ग़र हृदय अपार, तो तुम्हें धड़कन हर बार लिख दूँ..
मैं ग़र श्वांस जीवन की,तो तुम्हें प्राणों का सार लिख दूँ..
मैं ग़र तरंग सप्तरंगी,तो तुम्हें सुनहेरी उमंग लिख दूँ..
मैं ग़र ख्वाहिश अधूरी ,तो तुम्हें मुकम्मल ख्वाब लिख दूँ..
मैं ग़र शब्द निरर्थक ,तो तुम्हें अर्थ सार्थक लिख दूँ..
मैं ग़र बिखरे अल्फ़ाज़,तो तुम्हें मधुर कविता लिख दूँ..
मैं ग़र उलझन बेहिसाब ,तो तुम्हें सुकून लिख दूँ ..
मैं ग़र नैना सूने,तो तुम्हें कजरे की धार लिख दूँ..
मैं ग़र पाक इबादत ,तो तुम्हें रहमते खुदा लिख दूँ..
मैं ग़र तन मिट्टी का,तो तुम्हें अमर आत्मा लिख दूँ..

Tuesday, 5 September 2017

गुरु का आभार




मैं तो कच्ची माटी थी,तुमने तपाकर मुझे चिकना घड़ा बना दिया
मैं तो नन्हा पौधा थी,तुमने सींचकर मुझे विराट वृक्ष बना दिया
मैं तो अमूल्य कोयला थी ,तुमने तराशकर मुझे बहुमूल्य हीरा बना दिया
मैं तो दिशाहीन रोशनी थी,तुमने खुद जलकर मुझे आफ़ताब बना दिया
मैं तो फर्श पर बिखरा मोती थी,तुमने पिरोकर मुझे माला बना दिया
मैं तो अबोध अनभिज्ञ थी,तुमने परखकर मुझे स्वयं से  मिला दिया
मैं तो अज्ञानी लक्ष्यहीन थी,तुमने हाँथ थामकर मुझे गंतव्य से मिला दिया
मैं तो हांड मांस का पुतला थी, तुमने परिश्रमकर मुझे मानव बना दिया||

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Monday, 4 September 2017

हमेशा ये क्यूँ कहते रहे...





हमेशा ये क्यूँ कहते रहे...

बेटी सबका ख्याल रखना
कभी ये क्यूँ नहीं कहा
बेटी अपना भी ध्यान रखना..



बेटी सबको खुश रखना
कभी ये क्यूँ नहीं कहा
बेटी तुम भी खिलखिला कर हँसना..

बेटी सबकी इच्छाएं पूरी करना
कभी ये क्यूँ नहीं कहा
बेटी अपनी  चाहत कभी मत दबाना..

बेटी सबका आदर करना,मान करना
कभी ये क्यूँ नहीं कहा
बेटी अपना सम्मान सबसे आगे रखना..

बेटी रिश्तों की गरिमा के लिए चुप रह जाना
कभी ये क्यूँ नहीं कहा
बेटी अपनी  गरिमा के लिए आवाज़ ज़रुर उठाना..

बेटी रिश्ते की मर्यादा के लिए थोड़ा सह जाना
कभी ये क्यूँ नहीं कहा
बेटी तुम्हारी मर्यादा कोई रोंदे तो मत सहना..

बेटी हर दिन दूसरों के  लिए  साँस लेना
पर
एक दिन तू खुद के लिए भी  जीना...

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Tuesday, 29 August 2017

मैं फिर निकली हूँ




जो सो गया है
उसे जगाने मैं फिर निकली हूँ

जो रूठ गया है
उसे मनाने मैं फिर निकली हूँ

जो बिख़र गया है
उसे सजाने मैं फिर निकली हूँ

जो छलक गया है
उसे छिपाने मैं फिर निकली हूँ

जो बहक गया है
उसे घर लाने मैं फिर निकली हूँ

जो खो गया है
उसे तलाशने मैं फिर निकली हूँ

जो सहम गया है
उसे ढाँढस बँधाने मैं फिर निकली हूँ

भीतर जो मृत-सा हो गया है
उसे जीने के कायदे बतलाने मैं फिर निकली हूँ

जलाकर उमंग का नया दीप
अंतर्मन का अँधेरा मिटाने मैं फिर निकली हूँ

हौंसलों को मन में लिए
ज़िन्दगी को आज़माने मैं फिर निकली हूँ

ख़ामोश हो गयी इस कलम को
एहसासों की जुबां देने मैं एक बार फिर निकली हूँ!

Saturday, 26 August 2017

कभी सोचती हूँ ..

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कभी सोचती हूँ..

क्या इस रोटी की भी कोई जाति होगी

फिर ख्याल आता नहीं

रोटी तो एक समान सबकी भूख मिटाती है


कभी सोचती हूँ ..

क्या इस हवा का भी कोई धर्म होगा

फिर ख्याल आता नहीं

हवा तो बिन फर्क किये सबकी सांसों में समाती है


कभी सोचती हूँ ..

क्या इस पानी का भी कोई मज़हब होगा

फिर ख्याल आता नहीं

पानी तो बिन भेदभाव किये सबकी प्यास बुझाता है


कभी सोचती हूँ ..

क्या ये उम्मीद भी किसी देवता को पूजती होगी

फिर ख्याल आता नहीं

उम्मीद तो सबके मन में एक- सी आशा की लौ जलाती है


बस फिर एक प्रश्न मन में उठता है

जब जीवन की ये बुनयादी आवश्यकतायें

इन्सान की जाती धर्म की परवाह नहीं करती

तो खुद इन्सान ही इन्सान को क्यूँ बांटता है

क्यूँ अलग अलग मज़हब से एक दुसरे को पहचानता है?

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